गुलज़ार

सावन की रात दक्षिण की हवा चलती हैराह नहीं मिलती। जो चाहा था वो भूल हुई, जो पाया है वो चाहा नहीं। मैं घूमता हूँमैं घूमता हूँ मैं घूमता हूँ - Poem by Gulzar.

अक्सर भूल जाते हैं हम फ़ज्र  के इरादे मग़रिब तक, मानो यूँ की रोज़ असर होते होते, ज़िंदगी दस्तक दे देती है।   

ज़िंदगी तो तब भी होती…

ख़ुद पे यक़ीन था उस पंछी को, दिल का भी पक्का था।  फिर भी अक्सर, अपनी परछाईं पानी में देखता,तो सोचता कि ये पंख और बड़े होते तो कितना अच्छा होता।फिर ख़ुद ही को समझाता, कि पंख होते ही ना, ज़िंदगी तो तब भी होती।  मायूस हो जाता था ख़ुद से कभी कभी, कुछ ना करता, कई दिन तक उड़ान... Continue Reading →

बहार और ख़िज़ाँ

दायमी नहीं, ये बहार चंद रोज़ की है,लुत्फ़ उठा लो, इसपे इतराना कैसा।पलक झपकते जब ख़िज़ाँ आएगी,तो ग़ुरूर खुद-ब-खुद छूट जाएगा।तब थोड़ा रो लेना, पर घबराना कैसा।सर्दी की खुश्की में धूप सेकना।धीमी सी आँच में फुल्ले फेंकना।खुली आँखों से हक़ीक़त तो देख ली,अब बंद आँखों से ख़्वाब भी देखना।बहार ने तो मुड़ कर आना ही... Continue Reading →

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